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विशिष्ट भाग का हिंदी अनुवाद या इसके इतिहास

ज़ियारत-ए-नहिया: कर्बला का दर्द और इमाम-ए-ज़माना (अ.त.फ़.श.) का विलाप प्रस्तावना

5. ज़ियारत-ए-नाहिया कब और कैसे पढ़ें?

इस ज़ियारत में बड़ी खूबसूरती से यह दर्शाया गया है कि इमाम हुसैन (अ.) की शहादत पर केवल इंसान ही नहीं, बल्कि पूरी कायनात, आसमान के फरिश्ते, दरिया, पहाड़ और जानवर तक रोए。

नोट: ज़ियारत मूल रूप से अरबी में है। यहाँ इसका हिंदी सारांश और अर्थ दिया जा रहा है।

पैगंबर के परिवार के प्रति अटूट निष्ठा।

यह इस ज़ियारत का सबसे मार्मिक हिस्सा है। इमाम मेहदी (अ.स.) शब्दों के माध्यम से उस दिन घटी हर पीड़ादायक घटना को जीवंत कर देते हैं। उन्होंने यह वर्णन इस प्रकार किया है मानो वह स्वयं उस समय घटित हो रही हों। इसमें इमाम हुसैन (अ.स.) की प्यास, उनके साथियों की बहादुरी, उनके परिवार (अहल-ए-बैत) पर हुए अत्याचारों, और अंत में कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन (अ.स.) के सिर का तन से जुदा होने तक की घटनाओं को बड़े ही विस्तार और गमगीन अंदाज में बयान किया गया है। इस ज़ियारत की एक अनूठी विशेषता यह है कि यह कर्बला के उन शहीदों का नाम लेकर उल्लेख करती है जो अन्य ज़ियारतों में नहीं मिलते।

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